स्वतंत्र छत्तीसगढ़ :
“थ्री जी, फोर जी, फाइव जी, चाहे कोई भी जी आ जाए, गुरूजी का स्थान नहीं ले सकता, गुरूजी सदैव श्रेष्ठ रहेंगे।
शिक्षक दिवस..आलेख
👏 तस्मै श्री गुरुवै नम: — सदैव कृतज्ञ रहेंगे
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा। गुरुर्साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।। संसार में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि गुरु ही भगवान के बारे में बताते हैं और जीवन में सफलता तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। बगैर गुरु के ज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। सदियों से गुरु की महिमा अनंत, अपार रही है। आधुनिक युग में भले ही संबोधनों में विविधता हो, गुरू, शिक्षक, टीचर, मोटिवेटर, मार्गदर्शक लेकिन सब मार्गप्रदाता ही हैं अत: आज उन सबके प्रति कृतज्ञ होने, आभार व्यक्त करने का दिन है।
हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति, विद्वान, दार्शनिक, भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म आज ही के दिन 05 सितम्बर सन् 1888 में तमिलनाडु के तिरुमनि गॉंव में हुआ था। उन्हीं के जन्म दिवस को शिक्षकों के सम्मान स्वरूप शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1952 से 1962 तक भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति व बाद में 1962 से 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति के पद पर कार्य किया। वे एक राजनीतिज्ञ से पहले दर्शनशास्त्री रूप में प्रसिद्ध विद्वान थे। वे प्रोफेसर, शिक्षक और राजनेता थे जिन्होंने आधुनिक भारत के विभिन्न संस्थानों को आकार देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1962 में जब वे भारत के दूसरे राष्ट्रपति के पद पर आसीन थे तब छात्रों ने अपने शिक्षक के जन्म दिवस 05 सितंबर को एक विशेष दिन के रूप में मनाने का उत्साह दिखाया। तब डॉ. राधाकृष्णन ने समाज में अपने विशेष योगदान और देश के आने वाली पीढ़ियों और उनके भविष्य को आकार देने का कार्य करने वाले शिक्षकों को सम्मान देने का आग्रह किया। उन्होंने अपने जन्म दिवस पर इच्छा जाहिर की कि 05 सितंबर को उनके जन्म दिवस के रूप में न मनाकर देश में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए समर्पित शिक्षकों का सम्मान किया जाए, यही उनके लिए जन्म दिवस की सबसे बड़ी खुशी होगी। तब से लेकर 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है और अपने मार्गदर्शक गुरूओं का सम्मान करते हुए कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
मॉं-बाप जन्म देते हैं लेकिन हमारा दूसरा जनम गुरू के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करके ही होता है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात हमारा भौतिक जन्म से विलग एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण होता है और इस संसार में अपना मौलिक स्थान सुनिश्चित करने में यही व्यक्तित्व सहायक होता है। जीवन निर्माण की प्रक्रिया में मॉं-बाप, दादा-दादी, बंधु-बॉंधव जाने कितनों का सहयोग, आशीष, शुभकामना और मार्गदर्शन रहता है लेकिन इन सब से अलग एक शिक्षक का मार्गदर्शन और आशीष हमें जीवन के लक्ष्य के करीब ले जाता है। जीवन में आने वाली विभिन्न चुनौतियों से निपटने में सहायक होता है। हम विभिन्न दिशाओं से विभिन्न रूपों में मिल रहे मार्गदर्शन से असमंजस की स्थिति में आ सकते हैं, एक शिक्षक ही उचित मार्ग का दर्शन कराता है और दिग्भ्रम की स्थिति से उबारता है।
“अज्ञान तिमिरांधश्र्च ज्ञानांजन शलाकया, चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नम:” इसीलिए भारतीय संस्कृति में भगवान से भी अधिक महत्व अपने गुरुओं को दिया गया है क्योंकि गुरु ही हमें दुनिया में सही-गलत का ज्ञान कराते हैं, आगे बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं। पूरी सृष्टि में, खासकर भारत भूमि में तो गुरु की वंदना व उनका स्थान सर्वोपरि रहा है। बहुत पहले से ही इस भुइंया पर ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े..’ का उद्घोष हुआ है और गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान प्रदान किया गया है। जिस ईश्वर की कल्पना हम करते हैं, हृदय में जिसका वास स्वीकारते हैं उस ईश्वर से साक्षात्कार भी गुरु ही कराता है। गुरु न केवल शिष्य का मार्गदर्शन करता है अपितु संपूर्ण समाज को अपने ज्ञान के आलोक से दिशा भी प्रदान करता है। गुरु अज्ञान रुपी अंधेरे को चीरते हुए शिष्य के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
भारत भूमि में गुरु वंदन की प्राचीन परम्परा रही है। हमारी संस्कृति में गुरु का स्थान प्राचीन काल से ही उच्च रहा है। गौतम बुद्ध, गुरु घासीदास, गुरु नानक, गुरु सांदीपनि, गुरु वशिष्ठ, गुरु विश्वामित्र, गुरु चाणक्य, गुरु अमरदास, गुरु रविदास सहित तमाम गुरुओं ने अपने युग में समाज का मार्गदर्शन किया और इसे ज्ञानात्मक गतिशीलता प्रदान की।
शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर उन तमाम गुरुओं का वंदन करते हुए मानवता की राह पर ज्ञान के प्रकाश की ओर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए। आधुनिक युग में चाहे जितनी भी उन्नति कर लें लेकिन मार्गदर्शन के लिए सदैव गुरु की ही आवश्यकता पड़ेगी। किसी ने क्या खूब कहा है, “थ्री जी, फोर जी, फाइव जी, चाहे कोई भी जी आ जाए, गुरूजी का स्थान नहीं ले सकता, गुरूजी सदैव श्रेष्ठ रहेंगे। गुरु का महत्व कभी न होगा कम, भले ही कर लें कितनी भी उन्नति हम। वैसे तो है इंटरनेट पे हर प्रकार का ज्ञान, पर अच्छे-बुरे की नहीं है उसे पहचान।।
राकेश नारायण बंजारे
खरसिया.