रायपुर : 02 अप्रैल 2025 (टीम)
छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट व्यय को व्यवस्थित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के तहत सभी विभागों को बजट खर्च को चार तिमाहियों में विभाजित कर व्यय करने की व्यवस्था करनी होगी, जिससे वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों में अनावश्यक खर्च की होड़ को रोका जा सके।
वित्त सचिव मुकेश कुमार बंसल द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रथम छमाही में 40 प्रतिशत और द्वितीय छमाही में 60 प्रतिशत बजट खर्च करने का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त, मार्च के महीने में अधिकतम 15 प्रतिशत तक ही व्यय करने की अनुमति होगी, जिससे वित्तीय वर्ष के अंतिम सप्ताह में होने वाले अप्रत्याशित खर्चों पर अंकुश लगाया जा सके।
बजट व्यय की चरणबद्ध व्यवस्था:
- प्रथम तिमाही में 25% और द्वितीय तिमाही में 15% व्यय अनिवार्य होगा।
- तृतीय तिमाही में 25% और चतुर्थ तिमाही में 35% बजट खर्च करना होगा।
- बजट आवंटन की प्रविष्टि दो चरणों में की जाएगी— प्रथम छमाही और द्वितीय छमाही के लिए।
- तिमाही आधार पर व्यय की निगरानी वित्त विभाग द्वारा की जाएगी।
बचत राशि के पुनर्विनियोग के प्रावधान:
यदि किसी विभाग द्वारा प्रथम छमाही में निर्धारित सीमा से कम व्यय किया जाता है, तो बची हुई राशि का 50% तृतीय तिमाही में व्यय के लिए अग्रेषित किया जा सकता है। इसके लिए विभागों को वित्त विभाग से अनुमति लेनी होगी। बचत की शेष 50% राशि आवश्यकता के अनुसार अन्य विभागों को आवंटित की जा सकती है।
मार्च में अनियंत्रित खर्च पर रोक:
वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि कई विभाग वित्तीय वर्ष के अंतिम सप्ताह में संपूर्ण बजट का आवंटन जारी कर देते हैं, जिससे वित्तीय अनियमितताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसे रोकने के लिए निर्देश दिए गए हैं कि मार्च माह में बिना वित्त विभाग की पूर्व सहमति के किसी भी योजना का बजट आवंटन या आहरण नहीं किया जाएगा।
अनुदान आवंटन में भी पारदर्शिता:
स्थापना अनुदान और अशासकीय संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदानों के लिए भी यही तिमाही आधार अपनाया जाएगा। प्रथम छमाही के लिए 40% और द्वितीय छमाही के लिए 60% की सीमा तय की गई है। यदि प्रथम छमाही में कम व्यय हुआ तो बची हुई राशि का 50% तृतीय तिमाही में व्यय किया जाना अनिवार्य होगा।
वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता पर जोर
इस नई व्यवस्था से वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा और विभागों को योजनाओं का सुचारु रूप से क्रियान्वयन करने में सहायता मिलेगी। इससे राज्य की आर्थिक नीतियों में स्थिरता और पारदर्शिता आएगी, जिससे समस्त विभागों का वित्तीय प्रबंधन अधिक प्रभावी होगा।