रायपुर : 18 मार्च 2025 (जी.भूषण राव )
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने एक बार फिर अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था के कारण सुर्खियां बटोरी हैं। सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अपनाई गई “वेळ में जाने पर स्वतः निलंबन” की नीति राज्य विधानसभा की एक अलग पहचान बन गई है। इस नियम के तहत, यदि कोई विधायक बार-बार सदन की गरिमा भंग करता है या कार्यवाही में व्यवधान डालता है, तो उसे स्वतः निलंबित कर दिया जाता है। यह व्यवस्था अन्य राज्यों की विधानसभाओं से अलग और अधिक प्रभावी मानी जा रही है।
क्या है ‘स्वतः निलंबन’ की यह विशेष व्यवस्था?
छत्तीसगढ़ विधानसभा में यह नियम लागू किया गया है कि यदि कोई विधायक तीन बार सदन की कार्यवाही में बाधा डालता है या अनुशासनहीनता करता है, तो उसे स्वतः निलंबित कर दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में अध्यक्ष को बार-बार चेतावनी देने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे सदन की कार्यवाही में अनावश्यक व्यवधान से बचा जा सकता है। हालांकि किसी और राज्य की विधानसभा में यह व्यवस्था लागू नहीं हो पायी है |
राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ विधानसभा की पहला ऐतिहासिक सत्र 14 दिसंबर 2000 को राजकुमार कालेज के जशपुर हाल में संपन्न हुवा था | उसके बाद दूसरा सत्र 27 फरवरी 2001 को बलोदाबाज़ार रोड पर स्थित विधानसभा भवन में हुवा था | पश्चात् 24 वर्षों से सभी सत्र इसी भवन में आयोजित किया जा रहा है |
बता दें की छत्तीसगढ़ विधानसभा के पहले अध्यक्ष स्व.राजेन्द्रप्रसाद शुक्ल ने 2001में सत्ता पक्ष और विपक्ष की सहमती के बाद गर्भगृह में सदस्यों के जाने पर स्वतः निलंबन की व्यवस्था लागू की | तब से लगातार यह व्यवस्था लागू है |
राजनीतिक गलियारों में मिली मिश्रित प्रतिक्रिया:
इस नियम को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। सत्ताधारी दल ने इसे अनुशासन बनाए रखने की दिशा में एक ठोस कदम बताया है, जबकि विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया है।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा, “यह नियम सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए लागू किया गया है। इससे विधायकों को मर्यादा में रहने और बहस को सार्थक बनाने में मदद मिलेगी।”
अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल:
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था अन्य राज्यों के लिए भी अनुकरणीय हो सकती है, क्योंकि इससे विधानसभा की कार्यवाही अधिक व्यवस्थित और अनुशासित हो सकेगी।
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