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चंदा और मदद मांगकर 16 करोड़ का लगवाया इंजेक्शन,लेकिन ज्यादा फायदा नहीं फिर पुरानी स्थिति में लौट रहा रायगढ़ का छयंग…

रायगढ़ : 04 जनवरी 2025 ( स्वतंत्र छत्तीसगढ़ )

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में 4 साल का एक बच्चा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। क्योंकि वो दुर्लभ बीमारी से जूझ रहा है। जिससे उसके हाथ-पैर काम नहीं कर रहे। परिवार ने चंदा किया, मदद मांगी और कंपनी के लकी ड्रा के जरिए 16 करोड़ का इंजेक्शन लगवाया, लेकिन उससे ज्यादा फायदा नहीं हुआ। अब वो फिर से पुरानी स्थिति में लौट रहा है।

दरअसल, पुसौर ब्लॉक के पुरंगा गांव का रहने वाला छयंग नायक महज 4 साल का है। जब वह पैदा हुआ तो 6 महीने बाद उसके हाथ-पैर और कमर अचानक काम करना बंद कर दिया। उसके किसान माता-पिता उसे इलाज के लिए कई अस्पताल में ले गए, लेकिन वहां कोई इलाज नहीं मिला।

ऐसे में छयंग के पिता नरेंद्र नायक और उनकी मां पद्मनी नायक निराश हो गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस बीमारी के बारे में पूछने पर उन्हें पता चला कि, उसे एसएमए टाइप 1 (स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी) है। यह एक दुर्लभ बीमारी है।

लक्की ड्रा में छयंग का नाम निकला

इस बीमारी का पता चलते ही उसके माता-पिता क्राउड फंडिंग से उसका इलाज की कोशिश, लेकिन 3 लाख 39 हजार 304 रुपए ही चंदा जोड़ पाए। इसी बीच दवा कंपनी के लक्की ड्रा में छयंग का नाम निकला। जिसके बाद 17 फरवरी 2022 को 14 महीने की उम्र में 16 करोड़ रुपए का ज्योलगेस्मा इंजेक्शन उसे मुंबई के एक अस्पताल में लगा था।

हाथों में आया मूवमेंट और कुछ बोलने भी लगा

इलाज के बाद परिवार समेत छयंग अपने घर आ गया। धीरे-धीरे उसके शरीर पर सुधार आने लगा। पहले की अपेक्षा हाथ अधिक मूवमेंट होने लगा, थोड़ी बहुत बोलने भी लगा। बैठना भी शुरू कर दिया। परिवार को लगा कि, अब उनका बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा। अपनी बहनों और गांव के बच्चों के साथ खेलेगा।

अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका छयंग

इंजेक्शन लगने के दो साल बाद भी छयंग के पैरों में ताकत नहीं आई है। छयंग के माता-पिता उसे गोद में उठाकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। हर दिन परिवार उम्मीद लगाए रहता है कि, आज नहीं तो कल छयंग अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा।

दूसरे बच्चों को खेलते देखते रहता है

छयंग की दो बड़ी बहने हैं। एक 9 साल और दूसरी 7 साल की है। वे अपने भाई के साथ खेलते हैं, लेकिन जब बच्चे घर के बाहर खेलते हैं, तो उन्हें छयंग दूर से बैठकर देखते रहता है। पैरों में ताकत नहीं होने से वह न खड़ा हो पाता है और न ही खुद से कहीं जा पाता है।

फीडबैक के लिए आज भी जाते हैं मुंबई

इंजेक्शन लगने के बाद भी छयंग को हर 6 महीने में मुंबई इलाज के फीडबैक के लिए जाना पड़ता है। वहां डॉक्टर उसकी कंडीशन को देखते हैं। अब तक उसे 4-5 बार ले जाया जा चुका है, लेकिन आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होने से छयंग के परिजन भी अब परेशान होने लगे हैं। हांलाकि फिजियोथेरेपी के लिए गांव से रायगढ़ अक्सर आते हैं। उसे दवा के रूप में विटामिन, कैल्शियम और प्रोटीन दिया जाता है।

पिता आर्थिक मदद के लिए सरकार को लिख चुके हैं पत्र

छयंग के पिता नरेन्द्र कुमार नायक का कहना है कि, एसएमए बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए बिहार शासन हर महीने 3 हजार रुपए पालन पोषण के लिए देती है। हमने भी 3 महीने पहले छत्तीसगढ़ सरकार को आर्थिक मदद के लिए पत्र लिखा था, लेकिन सहायता के लिए अब तक कोई मदद नहीं मिल सकी है।

बेटे को देखकर बहुत दुख होता है- मां

छयंग की मां पद्मनी नायक ने बताया कि, छयंग अब भी बहुत संघर्ष कर रहा है। उसे इस तरह संघर्ष करते देखकर बहुत दुख होता है। उसके उमर के बच्चे स्कूल जा रहे हैं। लेकिन वो अपने जीवन से संघर्ष कर रहा है।

क्या है एसएमए टाइप-1 दुर्लभ बीमारी

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी टाइप-1 एक दुर्लभ बीमारी है। इससे मांसपेशियां पूरी तरह से कमजोर हो जाती है। हाथ-पैर में मूवमेंट नहीं होता है। इसमें सांस लेने में भी परेशानी होती है। इस बीमारी से शरीर के कई अंग से पूरी तरह शून्य हो जाते हैं।

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