सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम में आधुनिक जांच तकनीकों, दिव्यांगता प्रबंधन और राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम पर हुई विस्तृत चर्चा
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एम्स रायपुर में कुष्ठ रोग और माइसेटोमा के निदान पर विशेष सीएमई आयोजित
80 से अधिक चिकित्सकों और प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
आधुनिक जांच तकनीकों और उपचार पद्धतियों पर विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव
राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम और निजी चिकित्सकों की भूमिका पर चर्चा
उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों के प्रभावी प्रबंधन पर दिया गया जोर
रायपुर। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर के त्वचा रोग विभाग की ओर से कुष्ठ रोग और माइसेटोमा के निदान एवं उपचार पर केंद्रित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम का आयोजन किया गया। भारतीय त्वचा रोग, रतिज रोग एवं कुष्ठ रोग विशेषज्ञ संघ (आईएडीवीएल) अकादमी ने छत्तीसगढ़ राज्य शाखा और एम्स रायपुर के सहयोग से इस कार्यक्रम का संचालन किया। इसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से आए 80 से अधिक चिकित्सकों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कुष्ठ रोग, माइसेटोमा और अन्य उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों की पहचान, नैदानिक मूल्यांकन और उपचार से संबंधित चिकित्सकों के ज्ञान एवं कौशल को मजबूत करना था। विशेषज्ञों ने रोगों के समय पर निदान, बेहतर उपचार रणनीतियों और मरीजों की देखभाल में बहुविषयक दृष्टिकोण के महत्व पर प्रकाश डाला।
एम्स के कार्यपालक निदेशक ने किया उद्घाटन
कार्यक्रम का उद्घाटन एम्स रायपुर के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने किया। इस अवसर पर अधिष्ठाता (शैक्षणिक) डॉ. एली महापात्रा, जेएसएस मेडिकल कॉलेज मैसूर की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रेणुगा पी.एस.एस., आईएडीवीएल छत्तीसगढ़ राज्य शाखा के अध्यक्ष डॉ. पीयूष अग्रवाल तथा एम्स रायपुर के त्वचा रोग विभागाध्यक्ष एवं आयोजन अध्यक्ष डॉ. सत्यकी गांगुली उपस्थित रहे।
आधुनिक जांच तकनीकों और उपचार पर वैज्ञानिक सत्र
कार्यक्रम के वैज्ञानिक सत्रों में कुष्ठ रोग और माइसेटोमा के निदान तथा प्रबंधन से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने कुष्ठ रोग में तंत्रिका संवहन परीक्षण, रोग के कारण होने वाली दिव्यांगता के प्रबंधन के लिए उपयुक्त स्प्लिंट का चयन, नमूना संग्रह की तकनीक और माइसेटोमा के निदान में ऊतक विकृति विज्ञान यानी हिस्टोपैथोलॉजी की भूमिका पर जानकारी साझा की।
इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में कुष्ठ रोग उपचार के इतिहास, राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम और कुष्ठ रोग नियंत्रण में निजी चिकित्सकों की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विचार-विमर्श हुआ। इन चर्चाओं का उद्देश्य चिकित्सकों को रोगों की पहचान और उपचार के लिए उपलब्ध प्रक्रियाओं की बेहतर समझ प्रदान करना था।
विशेषज्ञों ने साझा किए अपने अनुभव
वैज्ञानिक सत्रों में डॉ. नील प्रभा, डॉ. सरवाना सुक्रिया एस., डॉ. जयदीप नंदी, डॉ. अर्चना केचे, डॉ. राकेश कुमार गुप्ता, डॉ. डेविड हेनरी और डॉ. संदीप एस. जोगदंड ने विशेषज्ञ वक्ताओं के रूप में भाग लिया। डॉ. रेणुगा पी.एस.एस. ने कुष्ठ रोग एवं माइसेटोमा के प्रबंधन पर आयोजित पैनल चर्चा का संचालन किया। वहीं, डॉ. भव्य स्वर्णकार ने स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के लिए प्रश्नोत्तरी आयोजित की।
कार्यक्रम के दौरान चिकित्सकों को अपने नैदानिक अनुभव साझा करने, रोगों की पहचान में आने वाली कठिनाइयों पर चर्चा करने और मरीजों के लिए प्रभावी उपचार के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिला। विशेषज्ञों ने उपचार प्रक्रिया में अलग-अलग चिकित्सा विशेषज्ञताओं के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
निरंतर चिकित्सा शिक्षा को बताया महत्वपूर्ण
कार्यक्रम का नेतृत्व आयोजन अध्यक्ष डॉ. सत्यकी गांगुली और आयोजन सचिव डॉ. नील प्रभा ने किया। आयोजन में आईएडीवीएल छत्तीसगढ़ राज्य शाखा के अध्यक्ष डॉ. पीयूष अग्रवाल और सचिव डॉ. राकेश पटेल का भी सहयोग रहा।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर कुष्ठ रोग, माइसेटोमा और अन्य उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों के प्रभावी निदान एवं उपचार के लिए निरंतर चिकित्सा शिक्षा, विशेषज्ञों के बीच समन्वय और नवीनतम चिकित्सकीय ज्ञान के नियमित आदान-प्रदान को महत्वपूर्ण बताया गया। ऐसे शैक्षणिक आयोजन चिकित्सकों की क्षमता बढ़ाने और मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायक हो सकते हैं।
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