डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: राष्ट्रवाद, शिक्षा और अखंड भारत के प्रखर पुरोधा…

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नई दिल्ली / भारत

नई दिल्ली। 6 जुलाई का दिन भारतीय राजनीति और राष्ट्र जीवन में विशेष महत्व रखता है। आज देश महान शिक्षाविद, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहा है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके राष्ट्रवाद, निस्वार्थ सेवा और अखंड भारत के संकल्प को स्मरण किया। केंद्र सरकार 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में देशभर में दो वर्षीय स्मृति समारोह आयोजित कर रही है।

शिक्षा जगत से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का सफर

6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्मे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उनके कार्यकाल में भारतीय भाषाओं और भारतीय शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि वे भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को शिक्षा से जोड़ने के प्रबल समर्थक थे।

स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डॉ. मुखर्जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में देश के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने औद्योगिक विकास, आत्मनिर्भरता और आधुनिक भारत की आर्थिक नींव मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर वैकल्पिक राष्ट्रीय राजनीति की दिशा में कदम बढ़ाया।

भारतीय जनसंघ की स्थापना और वैचारिक विरासत

वर्ष 1951 में डॉ. मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक आधार को मजबूत किया। उनका मानना था कि राष्ट्र सर्वोपरि है और भारत की एकता, अखंडता तथा सांस्कृतिक पहचान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ मजबूत राष्ट्रवाद का पक्ष रखा।

अखंड भारत के लिए संघर्ष

डॉ. मुखर्जी का नाम विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के विशेष प्रावधानों के विरोध और राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” का नारा देते हुए समान संवैधानिक व्यवस्था की वकालत की। वर्ष 1953 में जम्मू-कश्मीर प्रवेश के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और हिरासत के दौरान उनका निधन हो गया। उनके बलिदान को आज भी राष्ट्रीय एकता के संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

125वीं जयंती पर राष्ट्र का नमन

125वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन साहस, नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और जनसेवा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि डॉ. मुखर्जी ने भारत की एकता, गौरव और प्रगति के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया तथा उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करता रहेगा।

इस अवसर पर कोलकाता सहित देश के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा दो वर्षीय राष्ट्रीय स्मृति समारोह के अंतर्गत विशेष कार्यक्रम, प्रदर्शनी और सांस्कृतिक आयोजन किए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य नई पीढ़ी को डॉ. मुखर्जी के विचारों और योगदान से परिचित कराना है।

आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार

वर्तमान समय में जब भारत आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत और समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। शिक्षा, उद्योग, सुशासन और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनकी सोच आज भी नीति निर्माण और सार्वजनिक जीवन में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

डॉ. मुखर्जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प, स्पष्ट विचार और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण किसी भी व्यक्ति को इतिहास में अमर बना सकते हैं। उनकी 125वीं जयंती केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के उन आदर्शों को आत्मसात करने का भी अवसर है, जिनके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

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