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करोड़ों दीपों की रोशनी में राजनीति और जनहित का सवाल…

स्वतंत्र छत्तीसगढ़ (सम्पादकीय) जी.भूषण राव

प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीपोत्सव: आस्था, जनभागीदारी या राजनीतिक संदेश?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों-करोड़ों दीप प्रज्ज्वलित किए गए। छत्तीसगढ़ में भी बड़े पैमाने पर ‘आशीर्वाद के दीये’ जलाए गए। यह दृश्य निस्संदेह आकर्षक था और भारतीय परंपरा में दीपक को प्रकाश, शुभता और आशा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी बड़े सार्वजनिक आयोजन को केवल उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, खर्च, संसाधनों और सामाजिक प्रभाव की कसौटी पर भी देखना चाहिए। सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाया जाना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि करोड़ों दीप जलाने से देश और समाज को वास्तविक रूप से क्या हासिल हुआ?

इतने बड़े पैमाने पर होने वाला आयोजन किसी भी राजनीतिक दल के लिए जनसंपर्क का प्रभावी माध्यम बन सकता है। प्रधानमंत्री के प्रति समर्थकों की भावना सार्वजनिक रूप से दिखाई देती है, पार्टी संगठन सक्रिय होता है और नेतृत्व की लोकप्रिय छवि को व्यापक मंच मिलता है। राजनीतिक दृष्टि से ऐसे कार्यक्रम कार्यकर्ताओं को जोड़ने, संगठन को सक्रिय रखने और जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर भी देते हैं। लेकिन लोकतंत्र में लोकप्रियता और जनहित एक ही चीज नहीं हैं। किसी नेता के समर्थन में बड़ी भीड़ जुटना या बड़ी संख्या में दीप जलना अपने आप में शासन की उपलब्धियों का प्रमाण नहीं हो सकता। सरकार की वास्तविक परीक्षा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों की स्थिति, कानून-व्यवस्था और आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से होती है।

इस आयोजन का एक सकारात्मक पक्ष यह हो सकता है कि यदि दीप स्थानीय कुम्हारों और छोटे कारोबारियों से खरीदे गए हों, तो उन्हें आर्थिक लाभ मिला होगा। बड़े स्तर पर मिट्टी के दीयों की मांग स्थानीय रोजगार और छोटे व्यवसायों को प्रोत्साहित कर सकती है। यदि प्रधानमंत्री के जन्मदिन को रक्तदान, स्वच्छता अभियान, गरीबों की सहायता, स्वास्थ्य शिविर और अन्य सामाजिक सेवा कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो उत्सव को जनसेवा का स्वरूप दिया जा सकता है।

यानी दीप केवल जलें ही नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के जीवन में भी प्रकाश पहुंचे, तो ऐसे आयोजन का सामाजिक अर्थ कहीं अधिक मजबूत हो जाता है। दूसरी ओर, करोड़ों दीप जलाने वाले आयोजनों में तेल, मोम, परिवहन, बिजली, सजावट और सफाई पर होने वाला खर्च भी सवाल खड़े करता है। यदि यह खर्च राजनीतिक दल, संगठन या समर्थक अपने संसाधनों से करते हैं, तो यह उनकी प्राथमिकता का विषय है। लेकिन यदि कहीं सरकारी धन, सरकारी मशीनरी या प्रशासनिक संसाधनों का इस्तेमाल किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन के आयोजन में किया गया है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

जनता को यह जानने का अधिकार है कि—आयोजन में कुल कितना खर्च हुआ? खर्च का स्रोत क्या था? कितने सरकारी संसाधनों का उपयोग हुआ? पर्यावरण और कचरा प्रबंधन की क्या व्यवस्था थी? आयोजन के बाद बची सामग्री का निपटारा कैसे किया गया? इन सवालों को उठाना किसी नेता का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग है।

भारत में राजनीतिक नेताओं के प्रति सम्मान और समर्थन व्यक्त करने की लंबी परंपरा रही है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उनके समर्थकों द्वारा उत्सव मनाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि जहां एक नागरिक किसी नेता के सम्मान में दीप जलाता है, वहीं दूसरा नागरिक उसी आयोजन के खर्च और उपयोगिता पर सवाल भी पूछ सकता है। दोनों अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। राजनीति में व्यक्तित्व महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन राष्ट्र किसी एक व्यक्ति से बड़ा है। करोड़ों दीपों की रोशनी कुछ घंटों के लिए वातावरण को जगमगा सकती है, लेकिन देश को स्थायी रोशनी चाहिए तो वह शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक न्याय, मजबूत संस्थाओं और पारदर्शी शासन से आएगी।

दीप जलाने में बुराई नहीं है। उत्सव मनाने में भी बुराई नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या उत्सव के बाद भी उसका प्रकाश समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचता है? यदि एक दीप किसी गरीब के घर में भोजन, किसी बच्चे के हाथ में किताब, किसी बेरोजगार के हाथ में रोजगार और किसी बीमार व्यक्ति तक इलाज पहुंचाने का माध्यम बन जाए, तो वह दीपोत्सव वास्तव में सार्थक होगा। वरना करोड़ों दीपों की चमक केवल कुछ घंटों की रोशनी बनकर रह जाएगी। देश को रोशनी केवल आसमान में नहीं, व्यवस्था में भी चाहिए।

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