सम्पादकीय :जी.भूषण राव
21 जुलाई 1993 की घटना पश्चिम बंगाल की राजनीति के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित किया बल्कि आने वाले दशकों की सत्ता और विपक्ष की राजनीति की दिशा भी तय की। उस दिन वोटर फोटो पहचान पत्र लागू करने की मांग को लेकर निकाले गए युवा कांग्रेस के मार्च पर हुई पुलिस गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हुई थी। यह घटना लंबे समय तक राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनी रही और ममता बनर्जी के राजनीतिक संघर्ष की पहचान भी बनी।
अब, घटना के 33 वर्ष बाद विधानसभा में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांतो चट्टोपाध्याय आयोग की रिपोर्ट पेश होने से यह मामला फिर चर्चा में है। रिपोर्ट में पुलिस गोलीबारी को उचित नहीं ठहराए जाने और जानलेवा बल के प्रयोग को कानूनी रूप से न्यायसंगत न मानने जैसी टिप्पणियां गंभीर हैं। यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई में लोगों की जान जाती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित होना आवश्यक है। लोकतंत्र में राज्य की शक्ति का प्रयोग हमेशा कानून और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए।
हालांकि, इस पूरे प्रकरण का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आयोग की रिपोर्ट 2014 में सरकार को सौंपे जाने के बावजूद सार्वजनिक नहीं हुई और अब सत्ता परिवर्तन के बाद उसे विधानसभा में प्रस्तुत किया गया। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी जांच रिपोर्ट का उद्देश्य सत्य सामने लाना है, तो उसे वर्षों तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? किसी भी सरकार के लिए पारदर्शिता केवल राजनीतिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दायित्व होना चाहिए।
वर्तमान सरकार ने रिपोर्ट को सार्वजनिक कर राजनीतिक जवाबदेही की बात कही है, वहीं विपक्ष इस कदम को राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बता सकता है। यही भारतीय राजनीति की वास्तविक चुनौती भी है कि ऐतिहासिक घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच उलझ जाती है। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों के न्याय, संस्थागत जवाबदेही और प्रशासनिक सुधार जैसे मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।
मुख्यमंत्री द्वारा यह घोषणा कि पीड़ित परिवार यदि नई एफआईआर दर्ज कराना चाहें तो सरकार कानूनी सहायता देगी, न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन किसी भी नई कार्रवाई का आधार केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्य, कानून और न्यायिक प्रक्रिया होनी चाहिए। साथ ही, यदि जांच में दस्तावेजों के गायब होने या प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक के संकेत मिले हैं, तो उनकी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन नागरिक अधिकार है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी। इन दोनों के बीच संतुलन तभी संभव है जब प्रशासन संयम, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों का पालन करे। 21 जुलाई 1993 की घटना केवल अतीत की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र में सत्ता चाहे किसी भी दल के पास हो, जवाबदेही और पारदर्शिता से समझौता नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दल बदल सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन न्याय की आवश्यकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती। यही इस ऐतिहासिक घटना से मिलने वाला सबसे बड़ा संदेश है।

