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बिल्हा का मांझी डेरा आज भी विकास से कोसों दूर, मछली पकड़कर गुजर-बसर कर रहे 35 परिवार…

बिल्हा (बिलासपुर) / छत्तीसगढ़

सड़क, पक्का मकान और सरकारी योजनाओं के अभाव में संघर्षपूर्ण जीवन जी रहा केवट समाज |
हेडलाइंस

बिलासपुर। बिल्हा विधानसभा क्षेत्र स्थित मांझी डेरा आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर नजर आ रहा है। यहां रहने वाले केवट समाज के करीब 35 परिवारों की जिंदगी पूरी तरह मछली पकड़ने के पारंपरिक कार्य पर निर्भर है। गांव के पुरुष और युवा हर सुबह अंधेरा रहते ही तालाब और नदियों की ओर निकल पड़ते हैं, ताकि दिनभर की मेहनत के बाद मिलने वाली मछलियों को बेचकर परिवार का भरण-पोषण कर सकें। गांव में सड़क, पक्का मकान, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी लोगों की परेशानियों को और बढ़ा रही है।

पीढ़ियों से चला आ रहा पारंपरिक व्यवसाय

मांझी डेरा के अधिकांश परिवार पीढ़ियों से मछली पकड़ने का काम करते आ रहे हैं। ग्रामीणों के पास खेती योग्य जमीन नहीं होने के कारण वे पूरी तरह तालाब और नदी पर निर्भर हैं। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि बचपन से उन्होंने यही काम देखा और अब नई पीढ़ी भी मजबूरी में इसी पेशे को अपनाने को विवश है। आर्थिक तंगी के चलते बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य भी प्रभावित हो रहा है।

सुबह से शुरू हो जाता है संघर्ष

गांव में सुबह 4 से 5 बजे के बीच ही हलचल शुरू हो जाती है। ग्रामीण जाल, डोंगी और अन्य जरूरी सामान लेकर मछली पकड़ने निकल जाते हैं। कई बार घंटों मेहनत के बाद भी पर्याप्त मछली नहीं मिलने से आमदनी प्रभावित होती है। बारिश के मौसम में नदी और तालाब का तेज बहाव खतरा बढ़ा देता है, जबकि गर्मियों में जलस्तर कम होने से मछलियों की संख्या घट जाती है। इससे परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट और गहरा जाता है।

महिलाएं और बच्चे संभाल रहे परिवार की जिम्मेदारी

मछली पकड़ने के बाद गांव की महिलाएं और बच्चे स्थानीय बाजारों में जाकर मछलियां बेचते हैं। इसी आय से परिवार की दैनिक जरूरतें पूरी होती हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ आज भी गांव तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। लोगों ने प्रशासन से सड़क, आवास, पेयजल और स्थायी रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की है।

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