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राज्यसभा की ओर बढ़ते कदम: क्या नया राजनीतिक अध्याय लिखने जा रहे हैं नीतीश कुमार?

नई दिल्ली / भारत

हाइलाइट बॉक्स:

नई दिल्ली में नामांकन, राजनीतिक संकेत गहरे

नई दिल्ली में गुरुवार सुबह जब नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे, तो इसे केवल एक संसदीय औपचारिकता नहीं माना जाएगा। हाल ही में अपने नेतृत्व में प्रचंड जनादेश हासिल करने के बाद उनका यह निर्णय राजनीतिक हलकों में कई प्रश्न खड़े कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बिहार की सक्रिय राजनीति से क्रमिक दूरी और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में नई भूमिका की संभावनाओं की ओर इशारा कर सकता है।

पुरानी इच्छा का सार्वजनिक संकेत

22 मार्च 2022 को विधानसभा परिसर में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान उन्होंने संकेत दिया था कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, पर राज्यसभा जाने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उस समय यह बयान अप्रत्याशित था, क्योंकि वे 2020 में दोबारा मुख्यमंत्री बने थे। तब इसे दिल्ली की राजनीति में संभावित भूमिका से जोड़कर देखा गया था। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह इच्छा लंबे समय से उनके मन में थी और अब परिस्थितियाँ उसके अनुकूल प्रतीत हो रही हैं।

लालू और सुशील मोदी से समानांतर राजनीतिक यात्रा

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और सुशील कुमार मोदी लंबे समय तक समानांतर धुरी रहे हैं। लालू प्रसाद 1977 में पहली बार लोकसभा पहुँचे, बाद में विधायक, एमएलसी और राज्यसभा सदस्य भी रहे। सुशील मोदी भी विधायक, लोकसभा सांसद, एमएलसी और अंततः राज्यसभा सदस्य बने। नीतीश कुमार विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं, पर राज्यसभा की सदस्यता अब तक उनके राजनीतिक जीवन का शेष अध्याय थी।

चारों सदनों का अद्वितीय रिकॉर्ड

भारतीय संसदीय व्यवस्था में विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—चारों सदनों की सदस्यता का रिकॉर्ड बेहद सीमित नेताओं के पास है। बिहार के संदर्भ में यह उपलब्धि अभी तक लालू प्रसाद और सुशील मोदी के नाम रही है। राज्यसभा में प्रवेश के साथ नीतीश कुमार भी इस विशिष्ट श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। यह उपलब्धि उनके दीर्घ राजनीतिक अनुभव और संस्थागत समझ को रेखांकित करेगी।

बिहार की राजनीति का नया मोड़

बिहार की राजनीति में यह कदम एक संक्रमण काल का संकेत भी माना जा रहा है। नीतीश कुमार कई बार यह स्वीकार करते रहे हैं कि वे कभी अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं ला सके, जबकि लालू प्रसाद ऐसा कर चुके थे। 2010 में 117 सीटें जीतने के बावजूद वे बहुमत से कुछ सीटें पीछे रह गए थे। अब जब उनका सक्रिय मुख्यमंत्री काल एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, राज्यसभा की ओर उनका रुख उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के अनुभवी और बहु-सदनीय प्रतिनिधित्व वाले नेताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर सकता है।

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