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अमेरिकी टैरिफ के झटके के बाद भारत की नई राह: एक्सपोर्ट और रोज़गार बचाने की जंग…

हाइलाइट बॉक्स:
• अमेरिका के 50% टैरिफ ने भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर की चिंता बढ़ाई
• नौकरियों और मैन्युफैक्चरिंग सपने पर मंडराया खतरा
• भारत ने नए अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए
• यूरोप, ब्रिटेन और लैटिन अमेरिका पर टिकी नई उम्मीद

अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर जारी खींचतान

अब भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बनती दिख रही है। अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत किए जाने के बाद वाशिंगटन और नई दिल्ली के रिश्तों में ठंडापन आ गया। इस फैसले का सीधा असर उन उद्योगों पर पड़ने का खतरा है, जहां लाखों लोग काम करते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के सपने और निर्यात आधारित रोज़गार दोनों को गहरा नुकसान हो सकता है।

इसी दबाव के बीच भारत ने अब अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

अमेरिका पर निर्भरता कम करने और जोखिम को फैलाने के लिए सरकार तेज़ी से नए ट्रेड एग्रीमेंट्स की ओर बढ़ रही है। पिछले साल भारत ने चार अहम व्यापार समझौते किए, जिनमें ब्रिटेन के साथ हुई डील को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसके अलावा यूरोपियन यूनियन, यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन, मेक्सिको, चिली और साउथ अमेरिका के मर्कोसुर ट्रेड ब्लॉक के साथ बातचीत जारी है। दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, यह दौर भारत के लिए ट्रेड डील्स के लिहाज़ से सबसे सक्रिय वर्षों में से एक रहा है, जहां मकसद अमेरिका से दूरी बनाना नहीं, बल्कि संभावित झटकों से खुद को सुरक्षित करना है।

इस नई दिशा का सबसे बड़ा फायदा

इस नई दिशा का सबसे बड़ा फायदा उन लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को मिल सकता है, जो अमेरिकी टैरिफ से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं। अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया का अनुमान है कि सिर्फ ब्रिटेन के साथ हुए समझौते से अगले तीन वर्षों में गारमेंट एक्सपोर्ट दोगुना हो सकता है। वहीं, यूरोपियन यूनियन के साथ संभावित डील से और भी बड़े अवसर खुल सकते हैं, भले ही स्टील और ऑटोमोबाइल एक्सपोर्ट को लेकर मतभेद अभी बने हुए हों। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रस्तावित बातचीत को अहम माना जा रहा है। कुल मिलाकर, वैश्विक दबावों के बीच भारत अब अपने एक्सपोर्टर्स, कामगारों और भविष्य की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए नए बाज़ारों में नई उम्मीद तलाश रहा है।

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