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नाबालिग को वयस्क समझकर दी थी 10 साल की सजा, हाईकोर्ट ने रिहा करने का दिया आदेश…

बिलासपुर : 09 जुलाई 2025

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चार साल से जेल में बंद एक युवक को बड़ी राहत दी है। हत्या के एक मामले में 16 साल की उम्र में गिरफ्तार किए गए इस युवक को चिल्ड्रन कोर्ट ने वयस्क मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस फैसले को गंभीर कानूनी खामी बताते हुए खारिज कर दिया और युवक को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

यह मामला कोरबा जिले के कटघोरा क्षेत्र का है। साल 2020 में हुई हत्या के मामले में पुलिस ने एक किशोर को गिरफ्तार किया था, जिसकी जन्म तारीख 15 जुलाई 2004 है और घटना 22 अगस्त 2020 को हुई थी। यानी घटना के समय उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी। बावजूद इसके, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने उसे वयस्क की तरह ट्रायल के लिए चिल्ड्रन कोर्ट भेज दिया।

सुनवाई में सामने आईं कई कानूनी खामियां
चिल्ड्रन कोर्ट ने 30 दिसंबर 2022 को सुनवाई के बाद किशोर को 10 साल के कठोर कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस संजय के अग्रवाल की एकल पीठ ने केस की विस्तृत समीक्षा की और कई गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियां पाईं।

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी के नाबालिग होने के बावजूद उसकी मानसिक स्थिति का कोई मूल्यांकन नहीं कराया गया। इसके अलावा सामाजिक रिपोर्ट की प्रति भी न तो आरोपी को और न ही उसके अधिवक्ता को दी गई, जबकि यह जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत अनिवार्य प्रक्रिया है।

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महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘अजीत गुर्जर बनाम मध्यप्रदेश राज्य’ और ‘वरुण ठाकुर बनाम दिल्ली सरकार’ जैसे मामलों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी नाबालिग को वयस्क मानकर मुकदमा चलाना हो, तो पहले उसकी सोच, समझ, परिपक्वता और मानसिक स्थिति की गंभीर जांच होनी चाहिए। इस केस में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी।

अब चूंकि आरोपी की वर्तमान उम्र 21 साल हो चुकी है, इसलिए पिछली मानसिक अवस्था का दोबारा मूल्यांकन भी संभव नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट ने चिल्ड्रन कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया और युवक को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

सभी बाल न्यायालयों को भेजी जाएगी आदेश की प्रति
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति छत्तीसगढ़ के सभी जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चिल्ड्रन कोर्ट को भेजी जाए, ताकि भविष्य में नाबालिगों से जुड़े मामलों में ऐसी गंभीर चूक न दोहराई जाए।

यह फैसला न केवल आरोपी के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह बाल अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए भी एक अहम उदाहरण बन सकता है।

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